नई दिल्ली/ देहरादून : हरिद्वार लोकसभा सांसद एवं उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने आज संसद में पर्वतीय राज्यों, विशेषकर उत्तराखंड में उपलब्ध पीरूल (पाइन नीडल्स), चीड़ से प्राप्त रेज़िन तथा अन्य वन-बायोमास के प्रभावी उपयोग का महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया।
उन्होंने सदन का ध्यान इस ओर आकर्षित करते हुए कहा कि वर्तमान में यह वन-बायोमास हमारी वन संपदा का लगभग 15 प्रतिशत होते हुए भी बड़े पैमाने पर जंगलों में जमा रहता है। इससे एक ओर मूल्यवान संसाधनों की बर्बादी होती है तो दूसरी ओर वनाग्नि की घटनाएँ बढ़ने का खतरा भी बना रहता है। यदि इनके संग्रहण, प्रसंस्करण और विपणन के लिए एक समेकित व दूरदर्शी नीति बनाई जाए, तो यह चुनौती पर्वतीय क्षेत्रों के लिए एक सशक्त आर्थिक अवसर में बदल सकती है।
सांसद त्रिवेन्द्र रावत ने कहा कि रेज़िन का उपयोग औषधि, पेंट, साबुन, काग़ज़ और रबर उद्योग में व्यापक रूप से होता है। वहीं पीरूल से बायो-फ्यूल और बायो-पैलेट्स बनाए जा सकते हैं, जबकि गिरी हुई पत्तियों से पर्यावरण अनुकूल बोर्ड और कम्पोस्ट का उत्पादन भी संभव है। इन संसाधनों के व्यवस्थित उपयोग से न केवल वनाग्नि की घटनाओं में कमी आएगी, बल्कि स्थानीय युवाओं और महिलाओं के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर भी सृजित होंगे।
उन्होंने यह भी कहा कि इससे पर्वतीय क्षेत्रों में हरित, टिकाऊ और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी तथा स्थानीय स्तर पर वन आधारित उद्यमिता को बढ़ावा मिलेगा।
सांसद त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि पीरूल और रेज़िन को रणनीतिक वन संसाधन घोषित करते हुए उनके संग्रहण, मूल्य संवर्धन और विपणन के लिए एक ठोस व समयबद्ध नीति बनाई जाए, ताकि पर्वतीय राज्यों के प्राकृतिक संसाधनों का समुचित उपयोग हो सके और स्थानीय लोगों की आय में वृद्धि हो।




