नई दिल्ली/देहरादून : फिजाओं में होली के रंगों की रंगत छाने लगी है। कुछ ही दिनों के बाद होली का त्यौहार है लेकिन हवा में होली के रंग घुलने लगे हैं, होली के गीतों की गुनगुनाहट अब नज़र आने लगी है। घर-गांव में होली से पहले होल्यारों की टोली होली खेलने निकलती है और गांव-गांव होली खेली जाती है। सदियों से ये परंपरा ये रिवाज चला आ रहा है। लेकिन पलायन की पीड़ा से कराह रहे पहाड़ों में इस परंपरा को जीवित रखने की बड़ी चुनौती खड़ी हो रही है। ऐसे में कुछ युवाओं ने इस परंपरा को जीवंत रखने का बीड़ा उठाया है। हालांकि अब फर्क ये है कि पहले गांव-गांव होल्यारों की टोली घूमती थी और अब शहरों में अपनों के बीच जाकर इस परंपरा को संजोने की कोशिश की जा रही है।
गुरुवार को गढ़वाल के राठ क्षेत्र के होल्यारों की टोली गढ़वाल सांसद अनिल बलूनी के आवास पर पहुंची। ढोल दमाऊ के थाप पर होली के गीत गाते बजाते होल्यारों की टोली जब गढ़वाल सांसद अनिल बलूनी के आवास पहुंची तो मंजर भावुक कर देने वाला था। बचपन की यादें फिर ताजा हो उठी जब होली के अवसर पर घर-गांव में होल्यारों की टोली आती थी। होल्यारों की टोली ने होली के गीतों के माध्यम से वीरान होते गांवों की पीड़ा को भी जाहिर किया।
गढ़वाल सांसद अनिल बलूनी ने कहा कि प्रसन्नता का विषय है कि नई पीढ़ी के युवा अपने पारंपरिक वाद्य यंत्र जैसे ढोल-दमाऊ, तुरही, भंकोरा आदि के साथ अपनी विशिष्ट पहचान को जीवंत कर रहे हैं। केवल होली के गीत ही नहीं बल्कि इनके गीतों में गढ़वाली संस्कृति, गांव-घर की यादें, प्रकृति, प्रेम, पलायन की पीड़ा और सामाजिक संदेश होते हैं। बचपन में गाँव में सुने गीतों को पुनः मौलिक रूप में सुनना भावुक कर देता है।वीरान होते गांवों की पीढ़ा व्यक्त करता गीत “पुराणी ड्येली गया तुमरी तख ताला लग्यांन…” बहुत मार्मिक संदेश देता है।
दरअसल गढ़वाल लोकसभा के राठ क्षेत्र के युवाओं के द्वारा एक पहल की गई है। होली के अवसर पर होल्यारों की एक टोली तैयार कर ये युवा शहरों में बसे अपने लोगों के बीच जाते हैं और होली का पर्व मनाते हैं। होली के गीतों के माध्यम से वे उन पुरानी यादों और परंपराओं को भी आज जीवंत रखने का प्रयास कर है जो पलायन की पीड़ा के बीच लुप्त होने की कगार पर है। इन युवाओं की ये पहल इस परंपरा को जीवंत रखने की दिशा में एक सराहनीय कदम है।




